हमलोगों ने अपनी भाषा को
लिखने के लिए एक नई लिपि
‘जोलोम सीनी’ बनाई है.
खड़िया आदिवासी
खड़िया समुदाय, मुख्य रूप से मध्य भारत के झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और ओडिशा राज्यों में निवास करती है। यह तीन उप-समूहों में विभाजित हैः दूध खड़िया, ढेलकी खड़िया और पहाड़ी खड़िया। प्रत्येक उप-समूह की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक प्रथाएं और परंपराएं हैं, जो इनकी समृद्ध ज्ञान परंपरा और विविधतापूर्ण विरासत को दर्शाती हैं।
पारंपरिक रूप से, खड़िया लोग कुशल कृषक हैं और स्थानांतरित खेती करते हैं, पहले ये लोग अपनी आजीविका के लिए खेती और जंगल के संसाधनों पर निर्भर थे पर आज के समय में उच्च प्रशासनिक नौकरी से लेकर दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। हालांकि, पिछली एक सदी के दौरान हुए बाहरी धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक हस्तक्षेप और हाल के पर्यावरणीय परिवर्तनों व सामाजिक दबावों के कारण इनके पारंपरिक जीवन शैली में बहुत बदलाव आया है।
खड़िया आदिवासी समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत उनकी भाषा, संगीत, नृत्य और कला में स्पष्ट है। उनकी अनूठी पुरखा गीतों और कहानियों में, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं, प्रकृति और उनके पूर्वजों के साथ उनके गहरे संबंध में अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं।
खड़िया आदिवासी समुदाय पर सबसे पहला विस्तृत मोनोग्राफ एस. सी. रॉय ने लिखा है जो ‘द खड़ियाज’ शीर्षक से दो भागों में 1937 में प्रकाशित हुई है। इसका भाग-1 और भाग-2 यहां पर पढ़ा जा सकता है
खड़िया लाङ
खड़िया भाषा एक ऑस्ट्रो-एशियाई भाषा है जिसे भारत के खड़िया आदिवासी समुदाय के लोग बोलते हैं। इस भाषा को भाषाविदों ने आग्नेय भाषा परिवार के मुंडा उपसमूह की दक्षिणी शाखा में रखा है। यह एक अति प्राचीन भाषा है, जिसकी निकटतम संबंधी जुआंग भाषा है। दक्षिणी मुंडा शाखा में सिर्फ यही दो भाषाएं हैं। भारत में खड़िया भाषियों की संख्या 482,754 है।
परंपरागत रूप से खड़िया एक वाचिक भाषा है, जिसके बोले जाने का इतिहास लगभग साठ हजार साल पुराना है। हालांकि इसे मुंडा उपसमूह में रखा गया है पर यह इस उपसमूह की असुर, बिरहोर, बिरजिया, मुंडारी, संताली आदि भाषाओं से बहुत भिन्नता रखती है। खड़िया भाषा पर सबसे पहला अध्ययन ‘इंट्रोक्शन टू द खड़िया लैंग्वेज’ गगन चंद्र बनर्जी का है जो 1894 में छपी है।
यह भाषा तानवाला है, जिसका अर्थ है कि एक शब्दांश का स्वर एक शब्द का अर्थ बदल सकता है। इसमें प्रत्ययों और व्याकरणिक कणों की एक समृद्ध प्रणाली भी है, जो इसे भाषाई अध्ययन के लिए एक जटिल और आकर्षक भाषा बनाती है।
एक अल्पसंख्यक भाषा होने के बावजूद, यह खड़िया लोगों की सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न अंग बनी हुई है, जो उनकी मौखिक परंपराओं, पुरखा आख्यानों, गीतों, कथाओं और पुरखा ज्ञान को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
लगभग एक सदी से लोग खड़िया लिपि बना रहे हैं जिसमें हमारा प्रयास सबसे नया है।
खड़िया भाषा और लेखन पद्धति
अन्य आदिवासी भाषाओं की तरह खड़िया भी मुख्य रूप से वाचिक भाषा रही है। लेकिन औपनिवेशिक दिनों में जब ब्रिटिश प्रशासक और मिशनरियों ने आदिवासियों की ज्ञान परंपराओं को जानने के लिए उनके समाज, संस्कृति, इतिहास, भाषा आदि का मानवशास्त्रीय अध्ययन करना शुरू किया तब आदिवासी भाषाओं के लेखन की शुरुआत हुई। खड़िया लिखने का कार्य सबसे पहले रोमन लिपि में हुआ, फिर देवनागरी, ओड़िया, बांग्ला आदि अन्य भारतीय लिपियों में लिखा जाने लगा। झारखंड में यह मुख्य रूप से देवनागरी लिपि में लिखी जाती रही है।
बाहरी दुनिया की सामाजिक-आर्थिक घुसपैठ के कारण बीसवीं सदी के आते-आते यह स्थिति बदलने लगी। शिक्षा के प्रचार-प्रसार और बाहरी दुनिया द्वारा थोपी गई व्यवस्था ने पुरखों को पट्टे के जाल में बुरी तरह से फंसा लिया। हालांकि वे लोग इसके खिलाफ खूब लड़े लेकिन अंग्रेजों ने देशी महाजन, जमींदार का साथ लेकर, धर्म, छल-बल और भयानक हिंसा से हमें लिखंत-पढ़ंत की बाहरी संस्कृति को मानने के लिए मजबूर कर दिया। पर आदिवासी भाषाओं को न अंग्रेजों ने और न ही भारतीय संविधान ने स्वीकार किया। लिखित साहित्य, व्याकरण, लिपि का अड़ंगा डालकर हमें हमारी ही भाषाओं से दूर कर दिया।
लिपि की जरूरत और महत्ता कई आयामों में बंटी हुई है। यह न केवल व्यक्तिगत और सामाजिक संचार का माध्यम है, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, और सभ्यता के संकलन और संरक्षण का उपकरण भी है। इसके बिना, मानव समाज का विकास और प्रगति संभव नहीं होता। लिपि का महत्व आज के डिजिटल युग में भी उतना ही है, जितना प्राचीन काल में था, क्योंकि यह मानव विचारों और भावनाओं के स्थायी दस्तावेजीकरण का सबसे प्रभावी माध्यम है।
अन्य आदिवासी समुदायों की तरह खड़िया लोगों ने भी इस अड़चन को दूर करने के लिए बीड़ा उठाया। साहित्य रचना की, व्याकरण लिखा, मौखिक पुरखौती ज्ञान परंपराओं को सहेजा, उसका दस्तावेजीकरण किया, और लिपि भी बनाई। बीसवीं सदी के आरंभ में बीरु परगना के ताराबोगा निवासी करलुस डुङडुङ ने खड़िया लिपि बनाई थी। 1986 के आसपास नुअस केरकेट्टा भी एक लिपि लेकर आए। उसी दौर में एक लिपि बिरमित्रापुर के विधायक जुनास बिलुङ ने बनाई। लिपि बनाने वालों में एक नाम अम्ब्रस सोरेङ का भी है। लिपि बनाने वालों में हाल का नाम ख्रिस्तोफर डुङडुङ ये.स. का है। 2020 में इन्होंने एक नई लिपि ‘कलगा लुंङतोय’ का सृजन किया है जिसे 16 जुलाई 2023 को रांची में हुई एक बैठक में स्वीकार कर लिया गया है। और अब 2024 में, हम प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन की तरफ से आपको एक और नई खड़िया लिपि, ‘जोलोम सीनी’ भेंट कर रहे हैं।
जोलोम सीनी
‘जोलोम’ का अर्थ होता है पुताई और ‘सीनी’ हल के लिए प्रयोग किया जाता है। लिपि भाषा और ध्वनियों को नये रूप में प्रस्तुत करती है। रंगाई-पुताई भी घर को नई सुंदरता और नया ‘लुक’ देती है। ‘सीनी’ न होता तो धरती पर आसानी से लिख पाना संभव नहीं था। हल चलाकर खड़िया लोग कृषिजीवी कहलाए और जीने के लिए अन्न उपजाया। इस तरह दोनों शब्द मूल खड़िया संस्कृति के वाहक हैं और ‘लिपि’ व लेखन के अर्थ को खास संदर्भ प्रदान करते हैं। लिपि से भी हम शब्दों की खेती करते हैं और संवाद, संचार व साझाकरण का अनमोल ‘अन्न’ उपजाते हैं।
‘जोलोम सीनी’ नाम रखने का एक और कारण आदिवासियों की एकजुटता है। संतालों ने अपनी लिपि को ओलचिकि, हो लोगों ने वारङचिति और उरांवों ने अपनी लिपि का नाम ‘तोलोंग सिकि’ रखा है। लिपियों की इस लय को ‘जोलोम सीनी’ आगे बढ़ाता है और आदिवासी एकजुटता को मजबूत करता है।
‘जोलोम सीनी’ का आकार-प्रकार और उपयोग
यह खड़िया लिपि बहुत आसान है। इसे खड़िया जीवन परंपरा और संस्कृति के अनुरूप सृजित किया गया है। इसके आकारों में खड़िया संस्कृति के अनेक तत्त्वों की झलक मिलेगी। जैसे- मां, लेबु, बसाली गाय, हाथी, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, बाजा, और खड़िया पहचान वाले खोदा (गोदना)। इसके सारे अक्षर बहुत आसानी से याद किए और लिखे जा सकते हैं।
‘कोनजोगा’ खड़िया फॉन्ट
‘जोलोम सीनी’ लिपि का पहला फॉन्ट ‘कोनजोगा’ वर्सन 01 तैयार है जिसकी झलक आप इस परिचय पुस्तिका में देख सकते हैं। इस लिपि का निर्माण देवनागरी कीबोर्ड के अनुसार की गई है। यानी कोई भी व्यक्ति जो मोबाइल, टैब, आईपैड, लैपटाप या कंप्यूटर में देवनागरी या रोमन में टाइप करता है बिल्कुल उसी तरह से इस लिपि को आंख-मूंदकर लिख सकता है। इस लिपि को सीखने और टाइप करने के लिए अलग से न तो कीबोर्ड सीखना है और न ही किसी तरह के खास प्रशिक्षण की जरूरत है। एकदम आसान है। फॉन्ट को केवल अपने डिवाइस में इंस्टाल कीजिए और लिखना शुरू कर दीजिए। खड़िया यूनिकोड फॉन्ट आ जाने के बाद आपको इसे इंस्टाल भी नहीं करना पड़ेगा। तब आप दुनिया में कहीं भी अपनी खड़िया लिपि ‘जोलोम सीनी’ में आसानी से लिख सकेंगे, ठीक मंगल की तरह।
आप सबका सहयोग चाहिए
प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन आप सबसे अपील करती है कि डिजिटल होती दुनिया में ‘लिपि’ एक जरूरी औजार है। विश्वभर में छोटी सी छोटी भाषाएं भी लिपि के जरिए अपने भाषाई और सांस्कृतिक अस्तित्व को बचाने के लिए कमर कस चुकी है। अनेक आदिवासी लिपियां यूनिकोड फॉन्ट के साथ गूगल पर मौजूद हैं। खड़िया ज्ञान परंपरा और भाषिक क्षमता को बचाने, संरक्षित करने और आगे बढ़ाने के लिए ‘जोलोम सीनी’ एक मजबूत कदम है। इस लिपि के द्वारा फाडंउेशन उन सभी खड़िया विद्वानों के प्रयास को नमन करती है जिन्होंने समय-समय पर खड़िया लिपि बनाई।
आइए हमसब मिलकर उनके सपनों को साकार करने के लिए एकजुट हों। ‘जोलोम सीनी’ को अपनाएं। अपनी प्रतिक्रिया, आलोचनाएं और सुझाव भेजें ताकि यह सच्चे अर्थों में खड़िया समाज की व्यावहारिक लिपि बन सके।
9 अगस्त 2024 से ‘जोलोम सीनी’ खड़िया लिपि का पहला फॉन्ट ‘कोनजोगा’ का वर्सन 01 फाउंडेशन की वेबसाइट https://jolomsini/kharia.org पर कीबोर्ड मैप, खड़िया प्राइमर और अन्य सभी जरूरी जानकारियों के साथ उपलब्ध रहेगा। जिसे आप डाउनलोड कर इस्तेमाल कर सकते हैं। इस्तेमाल करने के बाद लिपि और फॉन्ट में मौजूद कमियों के लिए आप अपना सुझाव हमें जरूर भेजें ताकि इसे और सुंदर बनाया जा सके। आप सबके उलाहना और दुलार का इंतजार रहेगा।
जय जोहार। जय खड़िया। जय आदिवासी।
अरजी,
वंदना टेटे
प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन
रांची-सिमडाः (झारखण्ड)
‘जोलोम सीनी’ लिपि में लिखने के लिए तैयार हो जाइए !
आइए, खड़िया भाषा को डिजिटल युग में ले जाएं. खड़िया लिपि ‘जोलोम सीनी’ को अपनाएं और ‘कोनजोगा’ फॉन्ट के साथ खड़िया भाषा के एक नये युग की शुरुआत में सहभागी बनें.
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